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	<title>Travel Archives - Shiaqaum Live - Hindi &amp; Urdu News Portal</title>
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	<title>Travel Archives - Shiaqaum Live - Hindi &amp; Urdu News Portal</title>
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		<title>&#8216;अब मस्जिद बनाना नहीं होगा आसान..&#8217; इधर सब वक्फ में उलझे</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Admin]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 11 Oct 2023 05:45:51 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>जीवन में हर दिन एक नई शुरुआत होती है। चाहे कितनी भी मुश्किलें क्यों न हों, अगर इरादा मजबूत हो तो रास्ता अपने आप बन जाता है। जो लोग हार नहीं मानते, वही आगे बढ़ते हैं और कुछ नया कर दिखाते हैं। कभी-कभी छोटी-छोटी बातें भी हमें बड़ी सीख दे जाती हैं। किसी की मुस्कान, किसी का साथ या एक छोटा-सा प्रेरणादायक शब्द, दिल को छू जाता है और हमें आगे बढ़ने की हिम्मत देता है। आज की दुनिया में जानकारी सबसे बड़ी ताकत है।</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p data-start="133" data-end="323">जीवन में हर दिन एक नई शुरुआत होती है। चाहे कितनी भी मुश्किलें क्यों न हों, अगर इरादा मजबूत हो तो रास्ता अपने आप बन जाता है। जो लोग हार नहीं मानते, वही आगे बढ़ते हैं और कुछ नया कर दिखाते हैं।</p>
<p data-start="325" data-end="494">कभी-कभी छोटी-छोटी बातें भी हमें बड़ी सीख दे जाती हैं। किसी की मुस्कान, किसी का साथ या एक छोटा-सा प्रेरणादायक शब्द, दिल को छू जाता है और हमें आगे बढ़ने की हिम्मत देता है।</p>
<p data-start="496" data-end="658">आज की दुनिया में जानकारी सबसे बड़ी ताकत है। सही समय पर सही खबर या जानकारी मिलना बहुत ज़रूरी है। यही कारण है कि विश्वसनीय माध्यमों से जुड़ना हमारी ज़रूरत बन गई है।</p>
<p data-start="660" data-end="790">रिश्ते, भावनाएं और अनुभव – यही असली पूंजी हैं। टेक्नोलॉजी भले कितनी भी आगे बढ़ जाए, इंसानियत और जुड़ाव की अहमियत कभी कम नहीं होगी।</p>
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		<title>कोरियन लड़की की आप बीती- मुझे इस्लाम से नफ़रत थी, जिनता पढ़ती गई मोहब्बत बढ़ती गई</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Admin]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 06 Oct 2023 09:53:42 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>मुझे मध्य पूर्व और अरबों की हर चीज़ पसंद थी, लेकिन इस्लाम से नफ़रत थी, लेकिन मैं जितना इस्लाम के बारे में पढ़ती गई, उनती मोहब्बत बढ़ती गई, यहां तक कि मैं मुसलमान हो गई। जब भी कोई मध्य पूर्व या इस्लाम के बारे में बात करता, बिन सोंचे ग़ौर से उसकी बात सुनती, जब मैं हाई स्कूल में थी तो वामी क़ैम में शामिल हुई। यह वास्तव में तीन दिन और दो रातों की एक पिकनिक है जो इस्लाम और मुसलमानों के बारे में</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>मुझे मध्य पूर्व और अरबों की हर चीज़ पसंद थी, लेकिन इस्लाम से नफ़रत थी, लेकिन मैं जितना इस्लाम के बारे में पढ़ती गई, उनती मोहब्बत बढ़ती गई, यहां तक कि मैं मुसलमान हो गई।</p>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-737" src="https://shiaqaumlive.com/wp-content/uploads/2023/10/koriyan.jpg" alt="" width="522" height="452" srcset="https://shiaqaumlive.com/wp-content/uploads/2023/10/koriyan.jpg 522w, https://shiaqaumlive.com/wp-content/uploads/2023/10/koriyan-300x260.jpg 300w" sizes="(max-width: 522px) 100vw, 522px" /><br />
जब भी कोई मध्य पूर्व या इस्लाम के बारे में बात करता, बिन सोंचे ग़ौर से उसकी बात सुनती, जब मैं हाई स्कूल में थी तो वामी क़ैम में शामिल हुई। यह वास्तव में तीन दिन और दो रातों की एक पिकनिक है जो इस्लाम और मुसलमानों के बारे में क़रीब से जानने के लिए कोरिया के मुसलमानों द्वारा आयोजित की जाती है।</p>
<p>जब में आठ या नौ साल की थी तभी इराक़ का युद्ध शुरू हो गया था, तभी मैंने जाना के इनटरनेट का प्रयोग कैसे किया जाता है। और चूंकि हमारे देश के अमरीका के साथ नज़दीकी संबंध हैं इसलिए हमारे देश के अधिकतर लोग अमरीका के बारे में जानते हैं लेकिन मैं कभी भी इस देश को लेकर जिज्ञासु नहीं रही।</p>
<p>मैं पहली बार इराक़ के बारे में कुछ सुन रही थी, मुझ में इराक़ के बारे में और जानने की जिज्ञासा पैदा हुई, तब मैंने सुन रखा था कि उनका धर्म इस्लाम है। यही वह पहली बार था कि जब मैंने इस्लाम के बारे में सुना था, और मुझे लगता था कि इस्लाम शब्द का उच्चारण बहुत ही मीठा है और यह किसी धर्म के नाम जैसा नहीं लगता है!</p>
<p>इसलिए मैंने इस्लाम के बारे में इनटरनेट पर सर्च करना शुरू किया और मैने देखा कि वह लोग बहुत ही ठीले ठाले कपड़े पहनते हैं, अपने चेहरे को छिपाते हैं, और जैसा हिजाब मैंने अभी पहन रखा है वैसा हिजाब बहनते हैं, इस प्रकार मैंने इस्लाम और इराक़ के बारे में अधिक जाना।</p>
<p>लगभग दस साल पहले तक बहुत से लोग ऐसे थे जो इस्लाम के बारे में नकारात्मक सोंच रखते हैं और इस्लाम को बुरा समझते थे। मैं भी ऐसा ही सोचा करती थी। मेरे मन में सदैव इस्लाम के प्रति बुरे विचार चला करते थे। इस्लाम एक आतंकवाद है, इस्लाम यानी दाइश, इस्लाम और अलक़ायदा, इस्लाम और तालेबान।</p>
<p>यह वह चीज़ें थी जो इस्लाम का नाम सुन कर मेरे दिमाग़ में आती थीं। जब मैंने इस्लाम के बारे में बहुत अधिक पढ़ा और मध्य पूर्व में रहन वाले लोगों के अनुभवों के बारे में पढ़ा, तो मैंने इस्लाम और मुसलमानों को एक अलग शक्ल में देखा। लेकिन चूँकि मैं उस समय बहुत कम आयु की थी और किसी विदेशी भाषा को भी नहीं जानती थी, इसलिए मैंने इस्लाम के बारे में कोरियाई डाक्यूमेंट्रीज़ को तलाश करना शुरू किया।</p>
<p>उनमें से कुछ अरबों के बारे में थीं, कुछ मध्य पूर्व के बारे में, मुझे लगता है कि मैंने कोरियाई भाषा की सभी डाक्यूमेंट्रीज़ देख डालीं, साल बीतते गए प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च शिक्षा के दौर बीतते गए। इस्लाम के प्रति मेरी मोहब्बत बढ़ती गई, जब भी कोई इस्लाम या मध्य पूर्व के बारे में बात करता तो मैं अपने को कंट्रोल न कर पाती और उसकी बातों को ग़ौर से सुनने लगती।</p>
<p>जब मैं हाइ स्कूल में थी तो वामी कैंप में सम्मिलित हुई, यह कोरिया में चर्च के कैंप की भाति है। वास्तव में यह गर्मियों में तीन दिन और दो रातों की एक पिकनिक है, जो कोरियाई मुसलमानों के माध्यम से इस्लाम और मुसलमानों के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए आयोजित की जाती है। वह अब भी इसको आयोजित करते हैं, इसलिए अगर आप चाहें तो उनको कैंप में निशुल्क जा सकते हैं।</p>
<p>मैं उस कैंप में गई, अगरचे मैं इस्लाम, अरब और मध्य पूर्व के बारे में बहुत कुछ जानती थी, लेकिन मुझे स्वीकार करना पड़ेगा कि मैं बहुत डरी हुई और चिंतित थी, क्योंकि कोरिया में इस्लाम की बहुत ही बुरी छवि थी। लेकिन आतंकवाद का ही विषय नहीं था बल्कि वह अपराध भी थे जो कोरिया में मुसलमानों के ज़रिए अंजाम पाते थे और इसी प्रकार मुसलमान देशों जीन का निम्न स्तर भी एक विषय था।</p>
<p>मेरे माता पिता ने मुझ से कहा कि अगर कैंप में बहुत की आजीब प्रकार के लोग दिखाई दें तो तुरंत हमको फोन करना!! इस चीज़ ने मुझे और चिंतित कर दिया।</p>
<p>कैंप की पूरी अवधि में मैंने कोरिया में इस्लाम मस्जिदों को देखा। जब मैंने कांफ़्रेस रूप को खोला, तौ मैंने सच में एक बहुत ही सुंदर बहन को कमरे में देखा! उस समय वह कोरिया में मुस्लिम छात्र संघ की अध्यक्ष थीं। मैंने अपने आप से कहाः…. ओह… यह क्या है?!!</p>
<p>मैं वही हूँ जो इस्लाम के प्रति सदैव कट्टरपंथी सोच रखती थी! यहां पर तो कोई भी अजीब नहीं है! किसी ने भी सर से पैर तक काला कपड़ा नहीं पहन रखा है! वामी कैंप बहुत ही अच्छे के साथ समाप्त हो गया, मैंने परीक्षा दी और बहुत सी चीज़ें इस्लाम के बारे में जानीं, सभी के साथ मेरा बहुत ही अच्छा समय कटा।</p>
<p>तब मैंने एहसास किया कि मुझे इस्लाम के बार में और जानना चाहिए। इसलिए मैंने हर सप्ताह मस्जिद सलाम नूरी में होने वाले कार्यक्रम में सम्मिलित होना शुरू कर दिया, और वहां मैने अपने प्रशिक्षक चचा अमीन से मुलाक़ात की और उनसे बहुत कुछ सीखा, यहां तक कि मैं एक कोरियन मुसलमान बन गई। मुसलमान होने से एक साल पहले तक मैंने इस्लाम के बारे में बहुत की पढ़ा था।</p>
<p>एक चीज़ जो हमेशा मेरी ज़बान पर रहती थी वह यह थी कि मैं कभी भी मुसलमान नहीं होंगी। मैं मुसलमान नहीं बन सकती। मैं कैसे हर दिन हिजाब पहन सकती हूँ? यहां तक की जब गर्मी के दिनों में मेरे पिता टोपी पहनने के लिए कहते थे तब भी मैं टोपी तक नहीं पहनती थी। मैं यह नहीं करूँगी।</p>
<p>मुझे वास्तव में मध्य पूर्व और अरबों की हर चीज़ पसंद थी, लेकिन इस्लाम से नफ़रत थी, लेकिन मैं जितना इस्लाम के बारे में पढ़ती गई, उनती मोहब्बत बढ़ती गई, यहां तक कि मैं मुसलमान हो गई।</p>
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		<title>अमले उम्मे दाऊद- इमाम सादिक़ (अ) रिज़ाई माँ उम्मे दाऊद</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Admin]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 06 Oct 2023 09:51:53 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>उम्मे दाऊद कहती है कि मंसूर दवानेक़ी ने मदीने में सेना भेजी और हसने मुसन्ना और उनके भाई इब्राहीम को शहीद कर दिया और हसने मुसन्ना, इब्राहीम के पिता को कुछ लोगों के साथ गिरफ़्तार कर लिया, मेरा बेटा दाऊद भी उन लोगों में था। अमले उम्मे दाऊद फ़ातेमा जो कि उम्मे दाऊद ने नाम से प्रसिद्ध है, आप इमाम सादिक़ (अ) रिज़ाई माँ हैं उम्मे दाऊद कहती है कि मंसूर दवानेक़ी ने मदीने में सेना भेजी और हसने मुसन्ना और उनके भाई इब्राहीम को</p>
<p>The post <a href="https://shiaqaumlive.com/amle-umme-dawud-imam-sadiq-a-rizai-maa-umme-dawud/">अमले उम्मे दाऊद- इमाम सादिक़ (अ) रिज़ाई माँ उम्मे दाऊद</a> appeared first on <a href="https://shiaqaumlive.com">Shiaqaum Live - Hindi &amp; Urdu News Portal</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>उम्मे दाऊद कहती है कि मंसूर दवानेक़ी ने मदीने में सेना भेजी और हसने मुसन्ना और उनके भाई इब्राहीम को शहीद कर दिया और हसने मुसन्ना, इब्राहीम के पिता को कुछ लोगों के साथ गिरफ़्तार कर लिया, मेरा बेटा दाऊद भी उन लोगों में था।</p>
<p><img decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-734" src="https://shiaqaumlive.com/wp-content/uploads/2023/10/umme-daaod.jpg" alt="" width="1280" height="720" srcset="https://shiaqaumlive.com/wp-content/uploads/2023/10/umme-daaod.jpg 1280w, https://shiaqaumlive.com/wp-content/uploads/2023/10/umme-daaod-300x169.jpg 300w, https://shiaqaumlive.com/wp-content/uploads/2023/10/umme-daaod-1024x576.jpg 1024w, https://shiaqaumlive.com/wp-content/uploads/2023/10/umme-daaod-768x432.jpg 768w" sizes="(max-width: 1280px) 100vw, 1280px" /><br />
अमले उम्मे दाऊद</p>
<p>फ़ातेमा जो कि उम्मे दाऊद ने नाम से प्रसिद्ध है, आप इमाम सादिक़ (अ) रिज़ाई माँ हैं</p>
<p>उम्मे दाऊद कहती है कि मंसूर दवानेक़ी ने मदीने में सेना भेजी और हसने मुसन्ना और उनके भाई इब्राहीम को शहीद कर दिया और हसने मुसन्ना, इब्राहीम के पिता को कुछ लोगों के साथ गिरफ़्तार कर लिया, मेरा बेटा दाऊद भी उन लोगों में था।</p>
<p>मैंने उसकी रिहाई के लिए बहुत हाथ पैर मारे, बहुत से दरों पर गई लेकिन कुछ न हो सका।</p>
<p>एक दिन मैंने सुना कि इमाम सादिक़ (अ) जिनको मैंने दूध पिलाया था बीमार हो गये हैं मैं उनको देखने गई, आपने दाऊद के बारे में प्रश्न किया दाऊद का नाम सुन कर मैं रोनी लगी, और कहा कि वह इराक़ की जेल में है, आप उसकी रिहाई के लिए दुआ करें।</p>
<p>इमाम सादिक़ (अ) ने कहाः क्यों आपने अब तक दुआ -ए- इसतिफ़्ताह को नहीं पढ़ा? क्या आपको नहीं पता कि इस दुआ से आसमान के द्वार खुल जाते हैं और फ़रिश्ते दुआ करने वाले की दुआ स्वीकार किये जाने की ख़बर देते हैं, और जो भी इस दुआ को पढ़े उसकी दुआ अस्वीकार नहीं होती है, और ख़ुदा इस दुआ को पढ़ने वाले को जन्नत देता है।</p>
<p>उम्मे दाऊदः हे पैगम़्बर के बेटे यह दुआ क्या है और इसको पढ़ने का तरीक़ा क्या है?</p>
<p>इमाम सादिक़ (अ) हे माँ रजब का महीना क़रीब है और इस महीने में दुआ स्वीकार होती हैं, जैसे ही रजब का महीना आए और 13,14 और 15 हो जिसको अय्यामे बीज़ कहते हैं रोज़ा रखें, 15वीं को ज़ोहर के दिन ग़ुस्ल करें और 8 रकअत नमाज़ पढ़े&#8230;. उसके बाद आपने अमल का पूरा तरीक़ा मुझे बताया</p>
<p>अमले उम्मे दाऊद</p>
<p>इस दिन (15 रजब) के सबसे महत्वपूर्ण अमलों में से एक अमले उम्मे दाऊद है, जिसको दुआओं की पूर्ति ग़मों को दूर करने अदि के लिए बहुत प्रभावी है।</p>
<p>तरीक़ा</p>
<p>इसका तरीक़ा शेख़ कफ़अमी की पुस्तक मिस्बाह में आया है कि जो यह अमल करना चाहता है उसको चाहिए कि 13, 14, और 15 रजब को रोज़ा रखे, और 15 को ज़ोहर के समय ग़ुस्ल करे और ज़वाल के समय, ज़ोहर और अस्र की नमाज़ पढ़े और उसके रुकूअ और सजदों को बेहतरीन प्रकार से अंजाम दे और किसी ऐसे स्थान पर बैठे जहां कोई उसका ध्यान न भटका सके और किसी से बात न करे, जब नमाज़ समाप्त हो जाए तो क़िबले की तरफ़ चेहरा करके बैठ जाए और सौ बार सूरा अलहम्द, सौ बार सूरा तौहीद (क़ुल हुवल्लाहो अहद), दस बार आयतुल कुर्सी पढ़े, फिर सूरा अनआम (सूरा नम्बर 6), सूरा बनी इस्राईल (असरा, 17), कहफ़ (18), लुक़मान (31), यासीन (36), साफ़्फ़ात (37), हामीम सजदा (फ़ुस्सेलत 41), हामीम ऐन सीन क़ाफ़ (सूरा शूरा 42), दोख़ान (44), फ़त्ह (48), वाक़ेआ (56), मुल्क (67), नून (सूरा क़लम 68), एज़स्समाउन शक़्क़त (इनशेक़ाक़ 84), और उसके बाद क़ुरआन के अंत तक सारे सूरों को पढ़े, यह पढ़ने के बाद इस दुआ को पढ़े</p>
<p>صَدَقَ اللهُ الْعَظیمُ الَّذى لا اِلهَ اِلاّ هُوَ الْحَىُّ الْقَیُّومُ ذُو الْجَلالِ وَالاِْكْرامِ الرَّحْمنُ الرَّحیمُ الْحَلیمُ الْكَریمُ الَّذى لَیْسَ كَمِثْلِهِ شَىْءٌ وَ هُوَ السَّمیعُ الْعَلیمُ الْبَصیرُ الْخَبیرُ شَهِدَ اللهُ اَنَّهُ لا اِلهَ اِلاّ هُوَ وَالْمَلاَّئِكَةُ وَ اُولوُا الْعِلْمِ قاَّئِماً بِالْقِسْطِ لا اِلهَ اِلاّ هُوَ الْعَزیزُ الْحَكیمُ . وَ بَلَّغَتْ رُسُلُهُ الْكِرامُ وَ اَنَا عَلى ذلِكَ مِنَ الشّاهِدین.</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>َ اَللّهُمَّ لَكَ الْحَمْدُ وَ لَكَ الْمَجْدُ وَ لَكَ الْعِزُّ وَ لَكَ الْفَخْرُ وَ لَكَ الْقَهْرُ وَ لَكَ النِّعْمَةُ وَ لَكَ الْعَظَمَةُ وَ لَكَ الرَّحْمَةُ وَ لَكَ الْمَهابَةُ وَ لَكَ السُّلْطانُ وَ لَكَ الْبَهاَّءُ وَ لَكَ الاِْمْتِنانُ وَ لَكَ التَّسْبیحُ وَ لَكَ التَّقْدیسُ وَ لَكَ التَّهْلیلُ وَ لَكَ التَّكْبیرُ وَ لَكَ ما یُرى وَ لَكَ مالا یُرى وَ لَكَ ما فَوْقَ السَّمواتِ الْعُلى وَ لَكَ ما تَحْتَ الثَّرى وَ لَكَ الاْرَضُونَ السُّفْلى وَ لَكَ الاْخِرَةُ وَالاُْولى وَ لَكَ ما تَرْضى بِهِ مِنَ الثَّناَّءِ وَالْحَمْدِ وَالشُّكرِ وَالنَّعْماَّءِ .</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>اَللّهُمَّ صَلِّ عَلى جَبْرَئیلَ اَمینِكَ عَلى وَحْیِكَ وَالْقَوِىِّ عَلى اَمْرِكَ وَالْمُطاعِ فى سَمواتِكَ وَ مَحالِّ كَراماتِكَ الْمُتَحَمِّلِ لِكَلِماتِكَ النّاصِرِ لاَِنْبِیاَّئِكَ الْمُدَمِّرِ لاِعْداَّئِكَ . اَللّهُمَّ صَلِّ عَلى میكائیلَ مَلَكِ رَحْمَتِكَ وَالْمَخْلُوقِ لِرَاءْفَتِكَ وَالْمُسْتَغْفِرِ الْمُعینِ لاِهْلِ طاعَتِكَ .</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>اَللّهُمَّ صَلِّ عَلى اِسْرافیلَ حامِلِ عَرْشِكَ وَ صاحِبِ الصُّورِ الْمُنْتَظِر لاِمْرِكَ الْوَجِلِ الْمُشْفِقِ مِنْ خیفَتِكَ . اَللّهُمَّ صَلِّ عَلى حَمَلَةِ الْعَرْشِ الطّاهِرینَ وَ عَلىَ السَّفَرَةِ الْكِرامِ الْبَرَرَةِ الطَّیِّبینَ وَ عَلى مَلاَّئِكَتِكَ الْكِرامِ الْكاتِبینَ وَ عَلى مَلاَّئِكَةِ الْجِن انِ وَ خَزَنَةِ النّیرانِ وَ مَلَكِ الْمَوْتِ وَالاْعْوانِ یا ذَاالْجَلالِ وَالاِْكْرامِ .</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>اَللّهُمَّ صَلِّ عَلى اَبینا آدَمَ بَدیعِ فِطْرَتِكَ الَّذى كَرَّمْتَهُ بِسُجُودِ مَلاَّئِكَتِكَ وَ اَبَحْتَهُ جَنَّتَكَ اَللّهُمَّ صَلِّ عَلى اُمِّنا حَوّاَّءَ الْمُطَهَّرَةِ مِنَ الرِّجْسِ الْمُصَفّاتِ مِنَ الدَّنَسِ الْمُفَضَّلَةِ مِنَ الاِْنْسِ الْمُتَرَدِّدَةِ بَیْنَ مَحالِّ الْقُدُْسِ . اَللّهُمَّ صَلِّ عَلى هابیلَ وَ شَیْثٍ وَ اِدْریسَ وَ نُوحٍ وَ هُودٍ وَ صالِحٍ وَ اِبْراهیمَ وَ اِسْماعیلَ وَ اِسْحقَ وَ یَعْقُوبَ وَ یُوسُفَ وَالاْسْباطِ وَ لُوطٍ وَ شُعَیْبٍ وَ اَیُّوبَ وَ مُوسى وَ هارُونَ وَ یُوشَعَ وَ میشا وَالْخِضْرِ وَ ذِى الْقَرْنَیْنِ وَ یُونُسَ وَ اِلْیاسَ وَالْیَسَعَ وَ ذِى الْكِفْلِ وَ طالُوتَ وَ داوُدَ و َسُلَیْمانَ وَ زَكَرِیّا وَ شَعْیا وَ یَحْیى وَ تُورَخَ وَ مَتّى وَ اِرْمِیا وَ حَیْقُوقَ وَ دانِیالَ وَ عُزَیْرٍ وَ عیسى وَ شَمْعُونَ وَ جِرْجیسَ وَالْحَوارِیّینَ وَالاْتْباعِ وَ خالِدٍ وَ حَنْظَلَةَ وَ لُقْمانَ . اَللّهُمَّ صَلِّ عَلى مُحَمَّدٍ وَ آلِ مُحَمَّدٍ وَارْحَمْ مُحَمَّداً وَ آلَ مُحَمَّدٍ وَ بارِكْ عَلى مُحَمَّدٍ وَ آلِ مُحَمَّدٍ كَما صَلَّیْتَ وَ رَحِمْتَ وَ بارَكْتَ عَلى اِبْرهیمَ وَ آلِ اِبْرهیمَ اِنَّكَ حَمیدٌ مَجیدٌ .</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>اَللّهُمَّ صَلِّ عَلَى الاْوْصِیاَّءِ وَالسُّعَداَّءِ وَالشُّهَداَّءِ وَ اَئِمَّةِ الْهُدى اَللّهُمَّ صَلّ عَلَى الاْبْدالِ وَالاْوْتادِ وَالسُّیّاحِ وَالْعُبّادِ وَالْمُخْلِصینَ وَالزُّهّادِ وَ اَهْلِ الجِدِّ وَالاِْجْتِهادِ وَاخْصُصْ مُحَمَّداً وَ اَهْلَ بَیْتِهِ بِاَفْضَلِ صَلَواتِكَ وَ اَجْزَلِ كَراماتِكَ وَ بَلِّغْ رُوحَهُ وَ جَسَدَهُ مِنّى تَحِیَّةً وَ سَلاماً وَزِدْهُ فَضْلاً وَ شَرَفاً وَ كَرَماً حَتّى تُبَلِّغَهُ اَعْلى دَرَجاتِ اَهْلِ الشَّرَفِ مِنَ النَّبِیّینَ وَالْمُرْسَلینَ وَالاْفاضِلِ الْمُقَرَّبینَ اَللّهُمَّ وَ صَلِّ عَلى مَنْ سَمَّیْتُ وَ مَنْ لَمْ اُسَمِّ مِنْ مَلاَّئِكَتِكَ وَ اَنْبِی اَّئِكَ وَ رُسُلِكَ وَ اَهْلِ طاعَتِكَ وَ اَوْصِلْ صَلَواتى اِلَیْهِمْ وَ اِلى اَرْواحِهِمْ وَاجْعَلْهُمْ اِخْوانى فیكَ وَ اَعْوانى عَلى دُعاَّئِكَ . اَللّهُمَّ اِنّى اَسْتَشْفِعُ بِكَ اِلَیْكَ وَ بِكَرَمِكَ اِلى كَرَمِكَ و َبِجُودِكَ اِلى جُودِكَ وَ بِرَحْمَتِكَ اِلى رَحْمَتِكَ وَ بِاَهْلِ طاعَتِكَ اِلَیْكَ</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>وَ اَسئَلُكَ الّلهُمَّ بِكُلِّ ما سَئَلَكَ بِهِ اَحَدٌ مِنْهُمْ مِنْ مَسْئَلَةٍ شَریفَةٍ غَیْرِ مَرْدُودَةٍ وَ بِما دَعَوْكَ بِهِ مِنْ دَعْوَةٍ مُجابَةٍ غَیْرِ مُخَیَّبَةٍ یااَللهُ یا رَحْمنُ یا رَحیمُ یا حَلیمُ یا كَریمُ یا عَظیمُ یا جَلیلُ یا مُنیلُ یا جَمیلُ یا كَفیلُ یا وَكیلُ یا مُقیلُ یا مُجیرُ یا خَبیرُ یا مُنیرُ یا مُبیرُ یا مَنیعُ یا مُدیلُ یا مُحیلُ یا كَبیرُ یا قَدیرُ یا بَصیرُ یا شَكُورُ یا بَرُّ یا طُهْرُ یا طاهِرُ یا قاهِرُ یا ظاهِرُ یا باطِنُ یا ساتِرُ یا مُحیطُ یا مُقْتَدِرُ یا حَفیظُ یا مُتَجَبِّرُ یا قَریبُ یا وَدُودُ یا حَمیدُ یا مَجیدُ یا مُبْدِئُ یا مُعیدُ یا شَهیدُ یا مُحْسِنُ یا مُجْمِلُ یا مُنْعِمُ یا مُفْضِلُ یا قابِضُ یا باسِطُ یا هادى یا مُرْسِلُ یا مُرْشِدُ یا مُسَدِّدُ یا مُعْطى یا مانِعُ یا دافِعُ یا رافِعُ یا باقى یا واقى یا خَلاّقُ یا وَهّابُ یا تَوّابُ یا فَتّاحُ یا نَفّاحُ یا مُرْتاحُ یا مَنْ بِیَدِهِ كُلُّ مِفْتاحٍ یا نَفّاعُ یا رَؤُفُ یا عَطُوفُ یا كافى یا شافى یا مُعافى یا مُكافى یا وَفِىُّ یا مُهَیْمِنُ</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>یا عَزیزُ یا جَبّارُ یا مُتَكَبِّرُ یا سَلامُ یا مُؤْمِنُ یا اَحَدُ یا صَمَدُ یا نُورُ یا مُدَبِّرُ یا فَرْدُ یا وِتْرُ یا قُدُّوسُ یا ناصِرُ یا مُونِسُ یا باعِثُ یا وارِثُ یا عالِمُ یا حاكِمُ یا بادى یا مُتَعالى یا مُصَوِّرُ یا مُسَلِّمُ یا مُتَحَبِّبُ یا قاَّئِمُ یا داَّئِمُ یا عَلیمُ یا حَكیمُ یا جَوادُ یا بارِىءُ یا باَّرُّ یا ساَّرُّ یا عَدْلُ یا فاصِلُ یا دَیّانُ یا حَنّانُ یا مَنّانُ یا سَمیعُ یا بَدیعُ یا خَفیرُ یا مُعینُ یا ناشِرُ یا غافِرُ یا قَدیمُ یا مُسَهِّلُ یا مُیَسِّرُ یا مُمیتُ یا مُحْیى یا نافِعُ یا رازِقُ یا مُقْتَدِرُ یا مُسَبِّبُ یا مُغیثُ یا مُغْنى یا مُقْنى</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>یاخالِقُ یا راصِدُ یا واحِدُ یا حاضِرُ یا جابِرُ یا حافِظُ یا شَدیدُ یا غِیاثُ یا عاَّئِدُ یا قابِضُ یا مَنْ عَلا فَاسْتَعْلى فَكانَ بِالْمَنْظَرِ الاْعْلى یا مَنْ قَرُبَ فَدَنا وَ بَعُدَ فَنَاى وَ عَلِمَ السِّرَّ وَ اَخْفى یا مَنْ اِلَیْهِ التَّدْبیرُ وَ لَهُ الْمَقادیرُ وَ یا مَنِ الْعَسیرُ عَلَیْهِ سَهْلٌ یَسیرٌ یا مَنْ هُوَ عَلى ما یَشاَّءُ قَدیرٌ یا مُرْسِلَ الرِّیاحِ یا فالِقَ الاِْصْباحِ یا باعِثَ الاْرْواحِ</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>یا ذَاالْجُودِ وَالسَّماحِ یا راَّدَّ ما قَدْ فاتَ یا ناشِرَ الاْمْواتِ یا جامِعَ الشَّتاتِ یا رازِقَ مَنْ یَشاَّءُ بِغَیْرِ حِسابٍ وَ یا فاعِلَ ما یَشاَّءُ كَیْفَ یَشاَّءُ وَ یا ذَاالْجَلالِ وَالاِْكْرامِ یا حَىُّ یا قَیُّومُ یا حَیّاً حینَ لا حَىَّ یا حَىُّ یا مُحْیِىَ الْمَوْتى یا حَىُّ لا اِلهَ اِلاّ اَنْتَ بَدیعُ السَّمواتِ وَالاَْرْضِ یا اِلهى وَ سَیِّدى صَلِّ عَلى مُحَمَّدٍ وَ آلِ مُحَمَّدٍ وَارْحَمْ مُحَمَّداً وَ آلَ مُحَمَّدٍ وَ بارِكْ عَلى مُحَمَّدٍ وَ آلِ مُحَمَّدٍ كَما صَلَّیْتَ وَ بارَكْتَ وَ رَحِمْتَ عَلى اِبْرهیمَ وَ آلِ اِبْرهیمَ اِنَّكَ حَمیدٌ مَجیدٌ وَارْحَمْ ذُلىّ وَ فاقَتى وَ فَقْرى وَانْفِرادى وَ وَحْدَتى وَ خُضُوعى بَیْنَ یَدَیْكَ وَاعْتِمادى عَلَیْكَ وَ تَضَرُّعى اِلَیْكَ</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>اَدْعُوكَ دُعاَّءَ الْخاضِعِ الذَّلیلِ الْخاشِعِ الْخاَّئِفِ الْمُشْفِقِ الْباَّئِسِ الْمَهینِ الْحَقیرِ الْجائِعِ الْفَقیرِ الْعاَّئِذِ الْمُسْتَجیرِ الْمُقِرِّ بِذَنْبِهِ الْمُسْتَغْفِرِ مِنْهُ الْمُسْتَكینِ لِرَبِّهِ دُعاَّءَ مَنْ اَسْلَمَتْهُ ثِقَتُهُ وَ رَفَضَتْهُ اَحِبَتُّهُ وَ عَظُمَتْ فَجیعَتُهُ دُعاَّءَ حَرِقٍ حَزینٍ ضَعیفٍ مَهینٍ باَّئِسٍ مُسْتَكینٍ بِكَ مُسْتَجیرٍ اَللّهُمَّ وَ اَسئَلُكَ بِاَنَّكَ مَلیكٌ وَ اَنَّكَ ما تَشاَّءُ مِنْ اَمْرٍ یَكُونُ وَ اَنَّكَ عَلى ما تَشاَّءُ قَدیرٌ</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>وَ اَسئَلُكَ بِحُرْمَةِ هذَا الشَّهْرِ الْحَرامِ وَالْبَیْتِ الْحَرامِ وَالْبَلَدِ الْحَرامِ وَالرُّكْنِ وَالْمَقامِ وَالْمَشاعِرِالْعِظامِ وَ بِحَقِّنَبِیِّكَ مُحَمَّدٍ عَلَیْهِ وَ آلِهِ السَّلامُ یا مَنْ وَهَبَ لاِدَمَ شَیْثاً وَ لاِِبْراهیمَ اِسْماعیلَ وَ اِسْحاقَ وَ یا مَنْ رَدَّ یُوسُفَ عَلى یَعْقوُبَ وَ یا مَنْ كَشَفَ بَعْدَ الْبَلاَّءِ ضُرَّ اَیُّوبَ یا راَّدَّ مُوسى عَلى اُمِّهِ وَ زاَّئِدَ الْخِضْرِ فى عِلْمِهِ وَ یا مَنْ وَهَبَ لِداوُدَ سُلَیْمانَ وَ لِزَكَرِیّا یَحْیى وَ لِمَرْیَمَ عیسى یا حافِظَ بِنْتِ شُعَیْبٍ وَ یا كافِلَ وَلَدِ اُمِّ مُوسى</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>اَسئَلُكَ اَنْ تُصَلِّىَ عَلى مُحَمَّدٍ وَ آلِ مُحَمَّدٍ وَ اَنْ تَغْفِرَ لِى ذُنُوبى كُلَّها وَ تُجیرَنى مِنْ عَذابِكَ وَ تُوجِبَ لى رِضْوانَكَ وَ اَمانَكَ وَ اِحْسانَكَ وَ غُفْرانَكَ وَ جِنانَكَ وَ اَسئَلُكَ اَنْ تَفُكَّ عَنّى كُلَّ حَلْقَةٍ بَیْنى وَ بَیْنَ مَنْ یُؤْذینى وَ تَفْتَحَ لى كُلَّ بابٍ وَ تُلَیِّنَ لى كُلَّ</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>صَعْبٍ وَ تُسَهِّلَ لى كُلَّ عَسَیرٍ وَ تُخْرِسَ عَنّى كُلَّ ناطِقٍ بِشَرٍّ وَ تَكُفَّ عَنّى كُلَّ باغٍ وَ تَكْبِتَ عَنّى كُلَّ عَدُوٍّ لى وَ حاسِدٍ وَ تَمْنَعَ مِنّى كُلَّ ظالِمٍ وَ تَكْفِیَنى كُلَّ عاَّئِقٍ یَحُولُ بَیْنى وَ بَیْنَ حاجَتى وَ یُحاوِلُ اَنْ یُفَرِّقَ بَیْنى وَ بَیْنَ طاعَتِكَ وَ یُثَبِّطَنى عَنْ عِبادَتِكَ یا مَنْ اَلْجَمَ الْجِنَّ الْمُتَمَرِّدینَ وَ قَهَرَ عُتاةَ الشَّیاطینِ وَ اَذَلَّ رِقابَ الْمُتَجَبِّرینَ وَ رَدَّ كَیْدَ الْمُتَسَلِّطین عَنِ الْمُسْتَضْعَفینَ اَسئَلُكَ بِقُدْرَتِكَ عَلى ما تَشاَّءُ وَ تَسْهیلِكَ لِما تَشاَّءُ كَیْفَ تَشاَّءُ اَنْ تَجْعَلَ قَضاَّءَ حاجَتى فیما تَشاَّءُ.</p>
<p>इसके बाद सजदे में जाए और अपने दोनों गालों को ज़मीन पर रखे और कहे</p>
<p>اَللّهُمَّ لَكَ سَجَدْتُ وَ بِكَ امَنْتُ فَارْحَمْ ذُلّى وَفاقَتى وَاجْتِهادى وَ تَضَرُّعى وَ مَسْكَنَتى وَ فَقْرى اِلَیْكَ یا رَبِّ .</p>
<p>बेहतर यह है कि सजदे में आखों से आँसू जारी हो जाएं चाहे सूई की नोक के बराबर ही क्यों न हों और यह दुआ क़ुबूल होने की निशानी है।</p>
<p>The post <a href="https://shiaqaumlive.com/amle-umme-dawud-imam-sadiq-a-rizai-maa-umme-dawud/">अमले उम्मे दाऊद- इमाम सादिक़ (अ) रिज़ाई माँ उम्मे दाऊद</a> appeared first on <a href="https://shiaqaumlive.com">Shiaqaum Live - Hindi &amp; Urdu News Portal</a>.</p>
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		<title>शाबान महीने की तीन तारीख- तीसरा चाँद है और तीसरी शाबान है</title>
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		<pubDate>Fri, 06 Oct 2023 09:41:54 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>तीसरी हिजरी कमरी वर्ष के शाबान महीने की तीन तारीख थी। इसी दिन हज़रत अली अलैहिस्सलाम के घर में प्रकाश के चांद हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का जन्म हुआ। तीसरा चाँद है और तीसरी शाबान है &#124; तीसरी हिजरी कमरी वर्ष के शाबान महीने की तीन तारीख थी। इसी दिन हज़रत अली अलैहिस्सलाम के घर में प्रकाश के चांद हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का जन्म हुआ। अस्मा बिन्ते उमैस ने प्रकाश और आध्यात्म से भरे वातावरण में नवजात शिशु को एक सफेद कपड़े में लपेट</p>
<p>The post <a href="https://shiaqaumlive.com/the-third-day-of-the-month-of-shaban-is-the-third-moon-and-the-third-is-shaban/">शाबान महीने की तीन तारीख- तीसरा चाँद है और तीसरी शाबान है</a> appeared first on <a href="https://shiaqaumlive.com">Shiaqaum Live - Hindi &amp; Urdu News Portal</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>तीसरी हिजरी कमरी वर्ष के शाबान महीने की तीन तारीख थी। इसी दिन हज़रत अली अलैहिस्सलाम के घर में प्रकाश के चांद हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का जन्म हुआ।<br />
तीसरा चाँद है और तीसरी शाबान है |</p>
<p><img decoding="async" class="wp-image-731 alignleft" src="https://shiaqaumlive.com/wp-content/uploads/2023/10/imam-husain-as.jpeg" alt="" width="359" height="239" /></p>
<p>तीसरी हिजरी कमरी वर्ष के शाबान महीने की तीन तारीख थी। इसी दिन हज़रत अली अलैहिस्सलाम के घर में प्रकाश के चांद हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का जन्म हुआ। अस्मा बिन्ते उमैस ने प्रकाश और आध्यात्म से भरे वातावरण में नवजात शिशु को एक सफेद कपड़े में लपेट कर पैग़म्बरे इस्लाम की सेवा में ले गयीं। .</p>
<p>पैग़म्बरे इस्लाम ने बड़ी ही खुशी के साथ अपने नाती को अपनी गोद में लिया और उसके दाहिने कान में अज़ान और बायें कान में एक़ामत कही। पैग़म्बरे इस्लाम जब नवजात शिशु का नाम रखना चाहते थे तो उस समय महान ईश्वर के विशेष फरिश्ते हज़रत जीब्राईल उतरे और पैग़म्बरे इस्लाम से कहा ईश्वर आपको सलाम कहता हैं और फरमाता है” अली का आपसे वही रिश्ता है जो रिश्ता हारून का मूसा से था। तो इस बच्चे का नाम हारून के छोटे बच्चे के नाम पर रख दीजिये जो कि शब्बीर था और चूंकि आपकी भाषा अरबी है तो इस नवजात का नाम हुसैन रख दीजिये जिसका अर्थ शब्बीर है। इस आधार पर पैग़म्बरे इस्लाम ने हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का नाम हुसैन रख दिया। मित्रो स्वतंत्रता और मानवता के सबसे बड़े आदर्श के जन्म दिवस के शुभ अवसर पर आप सबकी सेवा में हार्दिक बधाई प्रस्तुत करते हैं।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम प्रकाश के वह प्रज्वलित दीप हैं जो इंसानों को प्रतिष्ठा एवं इज़्ज़त का मार्ग दिखाकर इतिहास में चमक रहे हैं। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अत्याचार के मुकाबले में समस्त मानवता को आज़ादी का पाठ दिया है, उसे इंसानियत कभी भुला नहीं सकती और हर इंसान इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से विशेष श्रृद्धा व लगाव रखता है। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम वह महान हस्ती हैं जिन्होंने बहादुरी, न्याय, प्रेम, त्याग और बलिदान का जो बेजोड़ उदाहरण पेश किया है वह समस्त मानवता के लिए आदर्श है। दूसरे शब्दों में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का सदाचरण हर इंसान के लिए आदर्श है चाहे उसका संबंध किसी भी धर्म, जाति या समुदाय से हो। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने जो महाआंदोलन किया उसका आधार पवित्र कुरआन की शिक्षाएं थीं। वास्तव में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने पवित्र कुरआन पर अमल करने के कारण ही यह कुर्बानी दी। उनकी कुर्बानी का मूल उद्देश्य मानवता को शिष्टाचार की परमकाष्ठा पर पहुंचाना था। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का लालन- पालन एसे महानतम परिवार में हुआ जिसका पूरे इतिहास में उदाहरण ही नहीं है। जिन हस्तियों ने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का लालन- पालन किया उनमें से हर एक समस्त विश्व वासियों के लिए परिपूर्ण आदर्श है। पैग़म्बरे इस्लाम पर जब वहि अर्थात ईशवरीय संदेश उतरता था तो अपने प्राणप्रिय नाती को भी उससे लाभान्वित करते थे। उनकी माता हज़रत फातेमा ज़हरा पवित्रता और ईश्वरीय भय में अपना उदाहरण स्वयं थीं और पिता हज़रत अली अलैहिस्सलाम धैर्य, साहस, वीरता, न्याय और सदाचारिता सहित समस्त सदगुणों की प्रतिमूर्ति थे।</p>
<p>एक दिन पैग़म्बरे इस्लाम ने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को अपने कांधों पर बिठाये हुए लोगों से कहा” यह हुसैन बिन अली हमारी उम्मत के बेहतरीन व्यक्ति हैं उनके नाना समस्त पैग़म्बरों में सर्वश्रेष्ठ, और उनकी नानी खदीजा बिन्ते खुवैलिद ईश्वर और उसके पैग़म्बर पर ईमान लाने वाली विश्व की अग्रणी महिला और उनकी मां फातेमा मोहम्मद की बेटी और विश्व की समस्त महिलाओं की सरदार” इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने भी फरमाया है” सबके मध्य कौन है जिसका नाना मेरे नाना जैसा हो या शिक्षक मेरे पिता अली जैसा हो? मेरी मां फातेमा हैं और मेरे पिता बद्र और हुनैन में नास्तिकों का सफाया करने वाले थे”</p>
<p>इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का पालन -पोषण एसी हस्तियों ने किया है जो ईश्वरीय ग्रंध पवित्र कुरआन के शिक्षक थे। इसी कारण इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के पूरे जीवन के हर क्षण में पवित्र कुरआन की शिक्षाओं का चिन्ह स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम बचपने से ही पवित्र कुरआन से बहुत लगाव रखते थे। इसका कारण यह है कि पवित्र कुरआन की बहुत सी आयतें उस समय नाज़िल हुईं जब पैग़म्बरे इस्लाम इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के घर में थे। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का घर पवित्र कुरआन की शिशाओं का केन्द्र था। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम पवित्र कुरआन के महत्व के बारे में फरमाते हैं” जो कुरआन को सुने ईश्वर कुरआन के हर अक्षर के बदले में जिसे उसने सुना है, एक पुण्य प्रदान करेगा”</p>
<p>हज़रत इमाम हुसैन पवित्र कुरआन का बहुत सम्मान करते थे। उनके सम्मान की सीमा यह थी कि कभी कभी उनके समीपवर्ती लोग उन पर आपत्ति करते थे। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के एक बेटे पवित्र कुरआन की शिक्षा मदीने में अब्दुर्रहमान नाम के व्यक्ति के पास ग्रहण करते थे। एक दिन शिक्षक ने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के बेटे को सूरे अलहम्द की शिक्षा दी। जब इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के बेटे ने उनके सामने सूरये अलहम्द पढ़ा तो इमाम ने पवित्र कुरआन के शिक्षक को बुलाया और जब शिक्षक आ गया तो इमाम ने एक एक हज़ार दीनार और एक हज़ार वस्त्र दिए। जब कुछ लोगों ने आपत्ति जताई कि सूरये अलहम्मद की शिक्षा देने पर इतना बड़ा इनाम तो इमाम ने फरमाया” मैंने जो उपहार दिया है वह कहां और सूरये अलहम्द कहां!!</p>
<p>दान, क्षमा,परोपकार,दीन दुखिया की सहायता आदि वे अच्छे कार्य हैं जिन पर पवित्र कुरआन में बहुत बल दिया गया है और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम इन सदगुणों के अमली उदाहरण हैं।</p>
<p>पवित्र कुरआन के एक व्याख्याकर्ता यय्याशी ने मसअदा बिन सदक़ा नाम के व्यक्ति के हवाले से लिखा है कि एक दिन इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम निर्धनों व दरिद्रों के पास से गुज़र रहे थे। वे सब अपना दस्तखान बिछाकर सुखी रोटी खा रहे थे। इमाम से उन लोगों ने रोटी खाने का अनुरोध किया। इमाम ने उनके अनुरोध ने स्वीकार कर लिया और उनके साथ बैठकर सुखी रोटी खाई और पवित्र कुरआन की यह आयत तिलावत फरमाई” कि बेशक ईश्वर अकड़ने और घमंडी लोगों को पसंद नहीं करता है” उसके बाद इमाम ने फरमाया मैंने आप लोगों के निमंत्रण को स्वीकार किया और अब आप लोग भी मेरे निमंत्रण को स्वीकार कीजिये। सभी दरिद्रों व निर्धनों ने कहा हे पैग़म्बरे इस्लाम के नाती! हम सब आप के निमंत्रण को स्वीकार करते हैं। इसके बाद सब लोग इमाम के साथ इमाम के घर की ओर रवाना हो गये। जब इमाम अपने घर पहुंच गये तो उन्होंने अपनी दासी से कहा कि जो कुछ घर में है उसे ले आओ। इमाम ने दरिद्रों व निर्धनों की खूब आव भगत की।</p>
<p>इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने लोगों की भलाई व कल्याण के लिए किसी प्रकार के प्रयास में संकोच से काम नहीं लिया। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपने विभिन्न भाषणों में अत्याचारियों से मुकाबले को ईश्वर के मार्ग में संघर्ष और मानवता को जीवित करना बताया है। इसलिए इंसानों को किसी भी स्थिति में इस बात की अनुमति नहीं देनी चाहिये कि कोई भ्रष्ट और अत्याचारी शासक मानवता की प्रतिष्ठा से खिलवाड़ करे। इसी आधार पर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपने समय के धर्मभ्रष्ठ और अत्याचारी शासक के विरुद्ध महाआंदोलन किया। इसी विशेषता ने कर्बला की घटना को सर्वकालिक व अमर घटना में परिवर्तित कर दिया है।</p>
<p>इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के महाआंदोलन का एक उद्देश्य हर प्रकार के अपमान को नकार देना देना था। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अच्छाई का आदेश देने और बुराई से रोकने के उद्देश्य से अपना आंदोलन किया था। अगर कोई व्यक्ति आज भी अच्छाई का आदेश देता है और लोगों को बुराइयों से रोकता है तो वास्तव में वह इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के आंदोलन का अनुसरण कर रहा है। अच्छाई का आदेश देने वाले और बुराई से रोकने वालों को पवित्र कुरआन वास्तविक मोमिन कहता है।</p>
<p>मोमिन की एक विशेषता यह है कि वह अपमान को स्वीकार नहीं करता है और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम तो जन्नत व स्वर्ग के मोमिन जवानों के सरदार हैं, उनके अपमान स्वीकार करने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने पवित्र कुरआन की शिक्षाओं पर अमल करके दिखा दिया कि इज़्ज़त की मौत अपमान के जीवन से बेहतर है। पवित्र नगर मदीने के पथभ्रष्ठ शासक ने जब इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से धर्मभ्रष्ठ शासक यज़ीज़ के लिए बैअत लेने का फैसला किया तो इमाम ने सूरये अहज़ाब की ३३वीं आयत की तिलावत की। दूसरे शब्दों में इमाम ने सूरये अहज़ाब की ३३वीं आयत की तिलावत करके अमवी सरकार के गलत होने को स्पष्ट कर दिया और फरमाया धिक्कार हो तुझ पर हम पैग़म्बरे इस्लाम के परिजन हैं जिनके बारे में कुरआन ने कहा है कि निः संदेह ईश्वर चाहता है कि तुम अहलेबैत से हर प्रकार की अपविता को दूर रखे और तुम्हें उस तरह से पवित्र रखे जिस तरह पवित्र रखने का हक है”</p>
<p>इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के बेटे हज़रत इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम फरमाते हैं” आशूर की रात मेरे पिता ने अपने सभी साथियों व अनुयाइयों को एकत्रित किया और उनके लिए भाषण दिया, मैं भी भाषण सुनने के लिए वहां पहुंच। मेरे पिता ने अपने साथियों से कहा” मैं खुशी और नाखुशी दोनों में ईश्वर की बेहतरीन प्रशंसा करता हूं कि हमें नबुअत अर्थात पैग़म्बरी से सम्मानित किया और उसने मुझे कुरआन और धर्म की शिक्षा प्रदान की सुनने वाला कान और देखने वाला नेत्र प्रदान किया और जागरुक दिल प्रदान किया। हे ईश्वर मुझे आभार व्यक्त करने वालों की पंक्ति में शुमार फरमा”</p>
<p>इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम पवित्र कुरआन के वास्तविक अनुसरणकर्ता और उसके आदेशों को लागू करने वाले हैं। वास्तव में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने समस्त काल के लोगों को ईश्वरीय भय, सदाचारिता, सच्चाई, पुरूषार्थतता, आज़ादी, न्याय और अत्याचार से संघर्ष जैसे विषयों की शिक्षा दी है। इसी कारण इमाम हुसैन का प्रभाव मानव इतिहास में बहुत अधिक व प्रभावी है। विश्व के स्वतंत्रता प्रेमियों के सरदार के जन्म दिवस के शुभ अवसर पर एक बार फिर आप सबकी सेवा में हार्दिक बधाई प्रस्तुत करते हैं और आज के कार्यक्रम का समापन उनके एक स्वर्णिम कथन से कर रहे हैं” इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम फरमाते हैं” मैंने अपने पिता अली से सुना है कि जो व्यक्ति ईश्वर की प्रसन्नता प्राप्त करने और पैग़म्बरे इस्लाम के प्रेम में शाबान महीने में रोज़ा रखे तो ईश्वर प्रलय के दिन उसे अपनी प्रतिष्ठा से निकट कर देगा और उस पर स्वर्ग अनिवार्य कर देगा”</p>
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		<title>प्रोफ़ेसर हुसैन अनसारीयान का ज़िंदगी नामा और उनके महत्त्वपूर्ण कार्य एवं उनकी फारसी रचनाए</title>
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		<pubDate>Sun, 01 Oct 2023 12:00:01 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>शताब्दियो (सदियो) से शहर ख़ुनसार ने मानव समाज के लिए बड़े विद्वान, साहित्यिक और कलात्मक एवम स्थिर चेहरो को जन्म दिया है। विद्वान (इल्मि) और मलाकूती चेहरे जैसे स्वर्गीय आयतुल्लाह अलउज़मा आक़ा हुसैन ख़ुनसारी (र.अ.), स्वर्गीय आयतुल्लाह अलउज़मा आक़ा जमाल ख़ुनसारी (र.अ.), स्वर्गीय आयतुल्लाह अलउज़मा आक़ा सैय्यद मुहम्मद तक़ी ख़ुनसारी (र.अ.), स्वर्गीय आयतुल्लाह अलउज़मा आक़ा सैय्यद अहमद ख़ुनसारी (र.अ.), एवम दूसरे हज़ारो विद्वान इरान के इसी शहर से संबंध रख़ते है। विद्वान हुसैन अनसारीयान ने 18 आबान (ईरानी साल का नवां महीना) सन 1323 हि.शम्सी</p>
<p>The post <a href="https://shiaqaumlive.com/for-the-love-of-bands/">प्रोफ़ेसर हुसैन अनसारीयान का ज़िंदगी नामा और उनके महत्त्वपूर्ण कार्य एवं उनकी फारसी रचनाए</a> appeared first on <a href="https://shiaqaumlive.com">Shiaqaum Live - Hindi &amp; Urdu News Portal</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>शताब्दियो (सदियो) से शहर ख़ुनसार ने मानव समाज के लिए बड़े विद्वान, साहित्यिक और कलात्मक एवम स्थिर चेहरो को जन्म दिया है।</p>
<p>विद्वान (इल्मि) और मलाकूती चेहरे जैसे स्वर्गीय आयतुल्लाह अलउज़मा आक़ा हुसैन ख़ुनसारी (र.अ.), स्वर्गीय आयतुल्लाह अलउज़मा आक़ा जमाल ख़ुनसारी (र.अ.), स्वर्गीय आयतुल्लाह अलउज़मा आक़ा सैय्यद मुहम्मद तक़ी ख़ुनसारी (र.अ.), स्वर्गीय आयतुल्लाह अलउज़मा आक़ा सैय्यद अहमद ख़ुनसारी (र.अ.), एवम दूसरे हज़ारो विद्वान इरान के इसी शहर से संबंध रख़ते है।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="wp-image-719 alignright" src="https://shiaqaumlive.com/wp-content/uploads/2023/10/husain-ansaryaan.jpeg" alt="" width="378" height="283" /></p>
<p>विद्वान हुसैन अनसारीयान ने 18 आबान (ईरानी साल का नवां महीना) सन 1323 हि.शम्सी को इसी शहर ख़ुनसार में जन्म लिया।</p>
<p>आप के पिता हाज शेख़ के परिवार से थे। यह जाना पहचाना परिवार जिसने इस्लाम धर्म की बहुत ज़्यादा(बहुत अधिक) सेवा की है, इस परिवार में बड़े बड़े विद्वानो ने जन्म लिया जिनमे स्वर्गीय आयतुल्लाह शैख़ मूसा अनसारियान ख़ुनसारी(र.अ.) का इल्मि एवम धार्मिक व्यक्तिकल्ब विशेषज्ञो से ढका छिपा नही है, इसी परीवार से संबंध रख़ते थे।</p>
<p>स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी(र.अ.) का कथन हैः कि शियों की फिक़्ह में किताबुस्सलात (यानी नमाज़ के पाठ)में सब से अच्छी किताब आयतुल्लाह अनसारियान(र.अ.) की है उनकी दसियों किताबै मौजूद हैं लेकिन उनमें से एक किताब मुनयातुत्तालिब है जो नजफ के प्रसिद्ध विद्वान (आलिम) आक़ा नाईनी के भाषणों का नोट है जो आप के कठिन परिश्रम का परीणाम है।</p>
<p>नजफ़ शहर में आयतुल्लाह इस्फ़हानी के बाद अधिकतर उलमा आप ही को मुजतहिद मानते थे परन्तु आयु ने साथ नही दिया और आयतुल्लाह इस्फ़हानी से पहले ही आप की म्रत्यु हो गई।</p>
<p>प्रोफेसर अनसारियान की माता का परिवार, इसी शहर के मुस्तफवी सादात परिवार से संबंधित है आप (प्रोफेसर) के मातृ पूर्वज इस शहर के माने जाने और विश्वासनीय वयक्ति थे अधिकतर देखने में आया कि जब भी नजफ़ या क़ुम्म के विद्वानो (उलमा) में से कोई विद्वान (आलिम) ख़ुनसार शहर आता तो इनके घर ज़रूर आता।</p>
<p>प्रोफेसर अपने बचपन का क़िस्सा इस प्रकार बताते है कि जब वह 3 वर्ष के थे तो एक दिन आयतुल्लाह सैय्यद मुहम्मद तक़ी ख़ुनसारी (र.अ.) हमारे पूर्वज (दादा) के घर पधारे, मैने दरवाज़ा खोला और सीधा जाकर आयतुल्लाह की आलिंगन (गोद) मे बैठ गया। मेरे दादा जी के विरोध करने पर उनहोने मना किया और दुलार करते हुए मुझ से प्रश्न किया तुम भविष्य मे क्या बनना चाहते हो? मैने उत्तर दिया आप जैसा बनूगा तो उन्होने मेरे लिए प्रार्थना की।</p>
<p>जब कभी भी उस समय, ज्वलन्त (नूरानी) चेहरे और उनकी की हुई प्रार्थना का विचार मेरे मन मे आता है तो मै समझता हूँ कि वह मेरे जीवन का कितना सुन्दर क्षण था।</p>
<p>उस्ताद अनसारियान अभी 3 वर्ष के ही थे कि भाग्य से परिवार वाले तेहरान मे स्थानात्रित हो गये और उस शहर के एक धार्मिक महल्ले (ख़ुरासान मार्ग) मे जीवन व्यतीत करने लगे।</p>
<p>उस समय आदरणीय आयुल्लाह हाज शेख़ अली अकबर बुरहान (र.अ.)क्षेत्र के इल्नी दात्यिव को पूरा कर रहे थे, उस्ताद ने एसे ही शिक्षक से लाभ उठाया, और सदैव इस बात के प्रचारक है कि आज तक मैने विद्वानो (उलमा) मे से उनके समान किसी को नही देखा।</p>
<p>आयतुल्लाह बुरहान एक शिक्षित एवम स्वछंद (ज़ाहिद) मुजतहिद थे उस समय (उन दिनो) वह लुरज़ादेह मस्जिद मे नमाज़ पढाया करते थे। वह विद्वान (आलिम) मस्जिद को इस प्रकार चला रहे थे कि वृद्ध, किशोर एवम बच्चे सभी उसकी ओर खिचे हुऐ थे, इसी प्रकार उन्होने इसी क्षेत्र मे एक धार्मिक पाठशाला खोली जिसमे पहली कक्षा से ही विधार्थी ख़द उन्ही से शिक्षा ग्रहण करते थे।</p>
<p>उस्ताद अनसारियान स्वर्गीय बुरहान के बारे मे इस प्रकार कहते है कि मैने उनसे सभाओ और कक्षा मे कई बार सुना है कि वह नही चाहते, कि उनकी मृत्यु तेहरान मे हो और अंतिम संसकार (दफ्न) भी वही पर किया जाये, और सदैव प्रार्थना करते थे यहा तक शबे क़दर (पवित्र रमज़ान मास की विशेष रात्रि) मे भी परमेश्वर से यही प्रार्थना करते थे, परिणाम स्वरूप सन् 1338 (हि. शम्सी) 1959 मे जब मेरी आयु 14 वर्ष से अधिक नही थी, हज की तीर्थ यात्रा मे मरमेश्वर के घर (ख़ानए काबा) के समीप (नज़दीक) उनका निधन हो गया और वही जददा शहर मे हज़रत हव्वा (ईश्वरीय दूत हज़रद आदन की पत्नि) की क़ब्र के समीप उनका अंतिम संसकार किया गया।</p>
<p>उस नैतिकता के गुरू (उस्तादे अख़लाक़) के प्रकाशित मुखड़े के दर्शन, एवम उनके जीवन और स्वभाव के तरीक़ो से प्रभावित हुआ जैसा कि आज भी प्रोफेसर अपने ईश्वरीय अध्यापक के रिक्त स्थान को अपने अंदर महसूस करते है।</p>
<p>प्रोफेसर अनसारियान बचपन से ही ईश्वरीय चेहरो (जैसे खुनसार शहर के बड़े विदवान आयतुल्लाह सैय्यद मुहम्मद तक़ी ग़ज़नफ़रि {र.अ.})से परिचित थे। दूबारा अपने स्वर्गीय शिक्षक के एक वाक़िया का वर्णन करते हैं कि जो उस्ताद के आत्मिक और बुद्दिमान मनुष्यो के प्रति प्रेम व मुहब्बत को बयान करता हैः शुरु मे जब मे मैं धार्मिक पाठशाला (दीनी मदरसे) में आया और आयतुल्लाह ग़ज़न्फ़री इस से सूचित हुए तो उन्हों ने मेरे धार्मिक विधार्थी होने के संबंध मे मेरी ज़बरदस्त दावत की, जिस मे मेरे पिता के परीवार और महल्ले वालो को भी बुलाया।</p>
<p>जवानी मे ज्ञान की वादी मे क़दम रखने के अवसर पर ऐसे धर्मपरायण विद्वान की दावत ने मुझ पर बहुत ही उत्साहवर्धक प्रभाव डाला। धर्मपरायण विद्वान स्वर्गीय ग़ज़नफ़री का जीवन सरल था और शाह के शासन मे कई वर्षो तक ख़ुनसार शहर मे नमाज़े जुमा पढ़ाई।</p>
<p>उन देवता सिफ़त चेहरो मे से एक चेहरा स्वर्गीय आयतुल्लाह सैय्यद हुसैन अलवी (र.अ.) का था। स्वर्गीय अलवी ख़ुनसार के प्रसिद्ध मुजतहिदो मे से थे जो ख़ुनसार के ऊचाई के क्षेत्र वाली (उसताद की माता के परिवार के महल्ले की) मस्जिद मे नमाज़ पढ़ाते और शिक्षा देते जिसमे सैकड़ो इस्लामी विधार्थीयो ने आप से शिक्षा ली। जब नजफ़े अशरफ़ (ईराक़ का एक प्रसिद्ध धार्मिक शहर) से शिक्षा हासिल कर ख़ुनसार लौटे तो आपके शिक्षको ने अपने पत्रो मे मुजतहिद लिखा था।</p>
<p>फिर प्रोफ़ेसर से उनकी बाते सुनते है: जिस वर्ष मैने क़बा,अमामा पहना और अपने स्वर्गीय नाना सैय्यद मुहम्मद बाक़िर मुस्तफ़वी (र.अ.), नानी और अपने परिवार के लोगो से मिलने ख़ुनसार गया था तो रोड पर मुझ से परिचित किसी व्यक्ति ने देखकर मुझ से कहा: क्या तुम आदरणीय असदुल्लाह की मस्जिद मे 10 रात्रियो तक भाषण दे सकते हो? मैने उत्तर दिया हाँ, जब मै पहले दिन मस्जिद गया तो वहा स्वर्गीय आयतुल्लाह अलवी को बैठा देख कर मुझे आश्चर्य हुआ कि इतने बड़े विद्वान होकर मुझ जैसे का भाषण सुनने आये है, मैने मन मे विचार किया शायद जिसकी मस्जिद है उस से कोई संबंध हो परन्तु मुझे बहुत आश्चर्य हुआ कि वह प्रत्येक 10 भाषण (मजलिस) मे आये मेरे भाषणो मे उनका आना सिर्फ मेरा उत्साह बढ़ाने हेतु होता था।</p>
<p>उनही मे से एक आयतुल्लाह हाजी सैय्यद मुहम्मद अली इब्नुर्रेज़ा ख़ुनसारी (दामत बरकातोह) है कि जिनके साथ रिश्तेदारी के नाते प्रोफ़ेसर का बचपने से उनके साथ उठ बैठ थी इस आलिम के प्रति प्रोफ़ेसर इस प्रकार विचार बयान करते है: कि मैने बचपने ही से इब्नुर्रेज़ा ख़ुनसारी (दामत बराकातोह)मे एक चीज़ देखी कि ज्ञान मे आगे समाज मे साहिबे हैसियत है वह मेरे ह्रदय मे बैठ गया, प्रत्येक बृहस्पतिवार को इशा की नमाज़ के पशचात ज़ियारते वारेसा (हज़रत अबाअब्दिल्लाहिल हुसैन {अ.स.}) खड़े खड़े रोते हुए लोगो के लिए पढ़ा करते थे इस विद्वान के हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) से इस प्रकार के संबंध ने मेरे उपर प्रभाव करने के पश्चात मेरे अन्दर नई जान डाल दी।</p>
<p>जिन लोगो से प्रोफ़ेसर के गहरे संबंध रहे है उनमे से एक स्वर्गीय इलाही क़ुमशेई (र.अ.) जिनके नैतिकता के पाठयक्रम (दरसे अख़लाक़) से बहुत अधिक सीख मिली है।</p>
<p>इन कारको (अवामिल) का संग्रह (परिवारी कारक और नैतिकता के कोच) कारण हुआ के उस्ताद ने हाई स्कूल के पश्चात धार्मिक पढ़ाई के लिए स्वर्गीय इलाही क़ुमशेई (र.अ.) से परार्मश के उपरान्त धार्मीक पाठशाला मे प्रवेश किया।</p>
<p>उस्ताद ने तेहरान और क़ुम के दो शिक्षालयो मे शिक्षा ग्रहण की तेहरान मे अरबी ग्रामर पढ़ी ग्रामर ख़त्म करके आयतुल्लाह मिर्ज़ा अली फ़लसफ़ी दामत बरकातोह जो उस समय लुरज़ादेह मस्जिद मे नमाज़ पढ़ाया करते थे उनसे मआलेमुल ओसूल किताब विशेष रूप से पढ़ाने का आग्रह किया ऐसे अनूठे विद्वान (कमनज़ीर आलिम) (कि जिनकी गिनती उन लोगो मे होती है कि जिनके लिए स्वर्गीय आयतुल्लाह अबुल क़ासिम ख़ुई (र.अ.) ने लिखित रूप मे इजतेहाद का दरजा दिया है) ने उस्ताद के निवेदन को स्वीकार कर लिया और आप ने उनके पास लुमआ के दो भाग और मआलिम समाप्त करके आयतुल्लाह फ़लसफ़ी दामत बरकातोह से क़ुम विश्वविघालय (होज़ए इल्मिया क़ुम) जाने की अनुमति मांगी। आयतुल्लाह फ़लसफ़ी ने उत्साह बढ़ाते हुए आप को गले लगाया और जब आपने सदुपदेश देने को कहा तो आयतुल्लाह फ़लसफ़ी ने पवित्र पैग़म्बर रसूले ख़ुदा (स.अ.व.अ.व.)की एक हदीस सुनाई (मन काना लिल्लाहे कानल्लाहो लहू) जो परमेश्वर के काम आऐगा परमेश्वर उसके काम आऐगा, प्रोफ़ेसर अनसारियान कहते है कि उस दिन से आज तक मेरा प्रयास रहा कि उनके आदेश का पालन करूँ और सदैव परमेश्वर के साथ रहूँ और मैने देखा भी कि मेरे पूरे जीवन मे परमेश्वर मेरे साथ है हाँ निश्चित रूप से, जो भी परमेश्वर के साथ रहेगा परमेश्वर भी उसके साथ रहेगा।</p>
<p>प्रोफ़ेसर का क़ुम विश्वविघालय (हौज़ए इलमिया क़ुम) मे भी तेहरान की तरह प्रयास रहा कि परमेश्वर के भक्तो के साथ रहै इसीलिए आप स्वर्गीय आयतुल्लाह हाज शेख अब्बास तेहरानी (र.अ.) के पास जाते थे और उनसे सम्पूर्ण लाभ उठाते थे।</p>
<p>भाषणो मे खुद उनकी और छात्रो की आँखो से आँसू जारी रहते थे।अंत मे स्वर्गीय आयतुल्लाह हाज अब्बास तेहरानी (र.अ.) के हाथो अमामा क़बा (यह एक प्रकार का विशेष पहनावा है) जैसा रूहानी वस्त्र पहना और अपनी शिक्षा को जारी रखा।</p>
<p>रसाइल, मकासिब और केफ़ाया (धार्मिक पुस्तको के नाम) आयतुल्लाह एतेमादी, स्वर्गीय आयतुल्लाह फ़ाज़िल लंकरानी, आयतुल्लाह सालेही नजाफ़ाबादी एवम आयतुल्लाह सानेई जैसे अनमोल विद्वानो से शिक्षा ग्रहण की।</p>
<p>इन किताबो की समाप्ती के पश्चात फ़िक़्ह (आदेश) ओसूल (सिध्दांतो) के विषयो मे इजतेहाद (एक डिग्री है) हेतु दर्से ख़ारिज (पाठयक्रम से बाहर, जिसमे आयतुल्लाह किसी मसले मे दूसरे विद्वानो के स्पष्टीकरण पर टिप्पणी करके उसका वर्णन करता है) मे गऐ इस मैदान मे भी स्वर्गीय आयतुल्लाह सैय्यद मुहम्मद मुहक़्क़िक़ दामाद (र.अ.), स्वर्गीय आयतुल्लाह मुनतज़ेरी (र.अ.), स्वर्गीय आयतुल्लाह शेख अबुलफ़ज़्ल नजफ़ी (र.अ.), और विशेष रूप से कई वर्षो तक स्वर्गीय आयतुल्लाह अलउज़मा हाज मिर्ज़ा हाशिम आमुली (र.अ.) जैसे महान धर्म गुरूओ (फ़ुक़्हा) से लाभ उठाया। उस्ताद के उन दिनो के पठन (पढ़ाई) का परिणाम स्वर्गीय आयतुल्लाह अलउज़मा हाज मिर्ज़ा हाशिम आमुली (र.अ.) फ़िक़्ह एवम ओसूल के भाषणो का नोट जिसको आप ने एकत्रित किया है। और दूसरे विषय जैसे हिकमत की आयतुल्लाह गिलानी से और इल्मे मआनी व बयान की तेहरान मे आदरणीय हुज्जतुल इस्लाम वल मुसलेमीन जवादी से शिक्षा ली।</p>
<p>वर्णनीय है कि उस्ताद ने इतने प्रयासो के पश्चात स्वर्गीय आयतुल्लह मिलानी (र.आ.), स्वर्गीय आयतुल्लाह अख़ुन्द हमादानी (र.अ.), स्वर्गीय आयतुल्लाह क़ुमरेई (र.अ.), स्वर्गीय आयतुल्लाह अलउज़मा हाज सैय्यद मुहम्मद रज़ा गुलपाएगानी (र.अ.), स्वर्गीय आयतुल्लाह सैय्यद अहमद ख़ुनसारी (र.अ.), स्वर्गीय आयतुल्लाह मरअशी नजफ़ी (र.अ.), और स्वर्गीय आयतुल्लाह अलउज़मा इमाम ख़ुमैनी (र.अ.) जैसे विद्वानो और धर्म गुरूओ से रेवाई आज्ञा पत्र (इजाज़ऐ इजतेहाद) प्राप्त किया।</p>
<p>प्रोफ़ेसर ने धर्मशास्त्र और विश्वविधालय (हौज़ए इल्मिया) की अंतिम डिग्रीया प्राप्ति एवम हौज़ए इल्मिया के महान अध्यापको से लाभ उठाने के पश्चात अपने मुख्य उद्देश्य तक पहुचने के लिए जो कि एक धार्मिक छात्र के लिए आवश्यक है वह रिसर्च करना, किताब लिखना और धर्म का प्रचार करना है, हौज़ए इल्मिया क़ुम से लौट आए और आज तक चालीस वर्षो से अधिक, और लगभग तीस हज़ार घंटे देश और विदेश मे भाषणो के माध्यम से अपने दिव्य कर्तव्यो की सेवा कर रहे है।</p>
<p>आप के भाषणो की छह (6) हज़ार कैसिटे बिना दोहराए और 80 विषय से अधिक 128 प्रतिया पुस्तके जो प्रोफ़ेसर के विवश होकर तेहरान मे निवास का परीणाम है।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>प्रोफ़ेसर की फारसी रचनाए</p>
<p>1. क़ुरआन करीम का अनुवाद।</p>
<p>2. नहजुल बलाग़ाह का अनुवाद।</p>
<p>3. सहीफ़ाए सज्जादिया का अनुवाद।</p>
<p>4. मफ़ातीहुल जेनान का अनुवाद एवम पुनर्लेखन।</p>
<p>5. शरहे दुआए कुमैल (दुआए कुमैल का वर्णन 2 भाग, पुर्नमुद्रण) ।</p>
<p>6. अहलेबैत (अ.स.) अरशियाने फ़रश नशीन।</p>
<p>7. मुआशरत (समाजशीलता) ।</p>
<p>8. जलवेहाई रहमते इलाही (इलाही रहमत के जलवे)।</p>
<p>9. फ़रहन्गे महरोज़ी (प्यार की संस्कृति) ।</p>
<p>10. इबरत आमूज़ ।</p>
<p>11. ज़ीबाइ हाई अख़लाक़ (सुंदर नैतिकता)।</p>
<p>12. तोबा आग़ोशे रहमत (पश्चताप दया की आलंगन)।</p>
<p>13. बर बाल अन्देशे (सोच के पंखो पर) भाग 1 ।</p>
<p>14. बर बाल अन्देशे (सोच के पंखो पर) भाग 2 प्रेस मे।</p>
<p>15. बा कारवाने नूर (प्रकाश के कारवान के साथ) ।</p>
<p>16. सीमाए नमाज.(नमाज. के बरकात)।</p>
<p>17. लुक़मान हकीम।</p>
<p>18. फ़ोरूग़ी अज़ तरबीयते इस्लामी (इस्लमी शिक्षा से प्रकाश की कड़ियाँ)।</p>
<p>19. रसाइले हज (हज-मक्का की तीर्थ यात्रा पर ग्रंथ)।</p>
<p>20. दीवाने मिसकीन (इरफ़ानी- रहस्मय दोहो का संग्रह)।</p>
<p>21. पुरसिशहा वा पासुख़हा (प्रश्नोत्तर) पाँच भाग, प्रेस मे है।</p>
<p>22. निज़ामे ख़ानवादे दर इसलाम (इसलाम मे परिवार की प्रणाली)।</p>
<p>23. मुनिसे जान (प्रियतम)।</p>
<p>24. इरफ़ाने इस्लामी (मिसबाहुश्शरीया का वर्णन) – (इस्लामी रहस्यवाद ) 15 भाग, पुर्नमुद्रण।</p>
<p>25. दयारे आशेक़ान (सहीफ़ए सज्जादिया का स्पष्टीकरण और वर्णन) &#8211; (प्रेमियो की भूमि) 15 भाग, पुर्नमुद्रण।</p>
<p>26. सैरी दर मआरिफ़े इस्लाम, (इस्लामी शिक्षाओ का सर्वेक्षण) भाग 1, अक़ल किलीदे गंजे सआदत (बुध्दि ख़ुशी के ख़ज़ाने की कुंजी)।</p>
<p>27. सैरी दर मआरिफ़े इस्लाम, (इस्लामी शिक्षाओ का सर्वेक्षण) भाग 2, अक़ल महरमे राज़े मलाकूत (बुध्दि स्वर्ग की गुप्त विश्वासपात्र)।</p>
<p>28. सैरी दर मआरिफ़े इस्लाम, (इस्लामी शिक्षाओ का सर्वेक्षण) भाग 3, हदीसे अक़ल वा नफ़्स (बुध्दि और आत्मा पर परीचर्चा)।</p>
<p>29. मजमूअए सुख़नरानीहाई मौज़ूई (22 विषयो पर आयोजित व्याख्यान का संग्रह)।</p>
<p>30. इस्लाम वा कारवान वा कोशिश (इस्लाम, कार्य और प्रयास)।</p>
<p>31. इस्लाम वा इल्म वा दानिश (इस्लाम, ज्ञान और शिक्षा)।</p>
<p>32. इमाम हसन इब्ने अली (अलैहिस्सलाम) रा बेहतर बेशनासीम (इमाम हसन पुत्र अली को भलीभांती पहचाने)।</p>
<p>33. मानवयत, असासीतरीन नियाज़े असरे मा (आध्यमिकता हमारे समय की सबसे बड़ी आवश्यकता)।</p>
<p>34. बे सुए क़ुरान वा इसलाम (क़ुरआन और इस्लाम के प्रति)।</p>
<p>35. मरज़े रोशनाई (प्रकाश की सीमा – गज़ल का संग्रह)।</p>
<p>36. मुनाजाते आरेफ़ान (रहस्यवादीयो की प्रार्थनाएं &#8211; शेरो का संग्रह)।</p>
<p>37. चश्मए सार इश्क़ (प्यार के फ़व्वारे – शेरो का संग्रह)।</p>
<p>38. गुलज़ारे मुहब्बत (प्रेम का बग़ीचा – शेरो का संग्रह)।</p>
<p>39. इबरतहाई रोज़गार (समय से सीख)।</p>
<p>40. नसीमे रहमत (दया की हवा)।</p>
<p>41. अख़लाक़े ख़ूबान (सज्जनो के नैतिक)।</p>
<p>42. दर बारगाहे नूर (प्रकाश की दहलीज़ पर)।</p>
<p>43. चहल हदीसे हज (मक्का की तीर्थ यात्रा की चालीस हदीसे)।</p>
<p>44. हज वादीए अमन (मक्का की तीर्थ यात्रा, सुरक्षा की भूमि)।</p>
<p>45. चेहरेहाई महबूब वा मनफ़ूरे क़ुरान (क़ुरआन मे लोकप्रिय एवम घिनौने चेहरे)।</p>
<p>46. अदब वा आदाबे ज़ायिर (तीर्थयात्रियो के संस्कार)।</p>
<p>47. राही बेसूए अख़लाक़े इसलामी (इस्लामी आचार दिशा मे एक पथ)।</p>
<p>48. विलायत व रहबरि अज़ दीदगाहे नहजुल बलाग़ा (नहजुल बलाग़ा की दृष्टिकोण से नेतृत्व और विलायत)।</p>
<p>49. मजमूआए मक़ालात (लेखो का संग्रह)।</p>
<p>50. ऊबूदीयत (प्रस्तुतिकरण, आज्ञानकलता)।</p>
<p>51. शफ़ा दर क़ुरआन (क़ुरआन मे चिकित्सा)।</p>
<p>52. नफ़्स (आत्मा)।</p>
<p>53. तक़रीराते दरसे मरहूम आयतुल्लाह अलउज़मा हाज मिर्ज़ा हाशिम आमुली (र.अ.) (स्वर्गीय शिया धर्म गुरू मिर्ज़ा हाशिम आमुली के ब्याख्यानो पर लिया एनोटेशन)।</p>
<p>54. तक़रीराते दरसे ख़ारिज मरहूम हाज शेख अबुलफ़ज़्ल नजफ़ी ख़ुनसारी (र.अ.) (स्वर्गीय शिया धर्म गुरू हाजी शेख अबुलफ़ज़्ल नजफ़ी ख़ुनसारी के ब्याख्यानो पर लिया एनोटेशन)।</p>
<p>55. सैरी दर मआरिफ़े इसलामी (18 भाग मजमूअए सुख़नरानीहाई मोज़ूई) (इस्लामी शिक्षाओ का सर्वेक्षण 18 भाग, विशेष विषयो पर आयोजित व्याख्यान का संग्रह ।</p>
<p>प्रोफ़ेसर अनसारियान की दूसरी भाषाओ मे अनुवाद हुई रचनाऔ की सूची इस प्रकार है।</p>
<p>1. बा कारवाने नूर (अंग्रेज़ी)।</p>
<p>2. निज़ामे ख़ानवादे दर इस्लाम (इसलाम मे परिवार की प्रणाली) (अंग्रेज़ी)।</p>
<p>3. निज़ामे ख़ानवादे दर इस्लाम (इसलाम मे परिवार की प्रणाली) (उर्दू)।</p>
<p>4. निज़ामे ख़ानवादे दर इस्लाम (इसलाम मे परिवार की प्रणाली) (रूसी)।</p>
<p>5. निज़ामे ख़ानवादे दर इस्लाम (इसलाम मे परिवार की प्रणाली) (तुर्की इसतामबुली)।</p>
<p>6. निज़ामे ख़ानवादे दर इस्लाम (इसलाम मे परिवार की प्रणाली) (अरबी)।</p>
<p>7. शरहे दुआए कुमैल (दुआए कुमैल का वर्णन) (अरबी)।</p>
<p>8. शरहे दुआए कुमैल (दुआए कुमैल का वर्णन) (उर्दू)।</p>
<p>9. शरहे दुआए कुमैल (दुआए कुमैल का वर्णन) (अंग्रेज़ी)।</p>
<p>10. तोबा आग़ोशे रहमत (पश्चताप दया की आलंगन) (अरबी)।</p>
<p>11. तोबा आग़ोशे रहमत (पश्चताप दया की आलंगन) (अंग्रज़ी)।</p>
<p>12. तोबा आग़ोशे रहमत (पश्चताप दया की आलंगन) (इसतामबुली)।</p>
<p>13. तोबा आग़ोशे रहमत (पश्चताप दया की आलंगन) (उर्दू)।</p>
<p>14. लुक़मान हकीम (उर्दू)।</p>
<p>15. दयारे आशेक़ान (अंग्रेज़ी) 2 भाग।</p>
<p>16. अहलेबैत (पवित्र पैग़म्बर के परीवार वाले) (उर्दू)।</p>
<p>17. अहलेबैत (पवित्र पैग़म्बर के परीवार वाले) (अरबी)।</p>
<p>18. अहलेबैत (पवित्र पैग़म्बर के परीवार वाले) (अंग्रज़ी)।</p>
<p>19. अहलेबैत (पवित्र पैग़म्बर के परीवार वाले) (रूसी)।</p>
<p>20. मुआशेरत (समाजशीलता) (अरबी, उर्दू, अंग्रेज़ी)।</p>
<p>The post <a href="https://shiaqaumlive.com/for-the-love-of-bands/">प्रोफ़ेसर हुसैन अनसारीयान का ज़िंदगी नामा और उनके महत्त्वपूर्ण कार्य एवं उनकी फारसी रचनाए</a> appeared first on <a href="https://shiaqaumlive.com">Shiaqaum Live - Hindi &amp; Urdu News Portal</a>.</p>
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		<title>क़ुरआन और मासूमीन अ.स. की हदीस की रौशनी में वालेदैन के लिए औलाद की ज़िम्मेदारियाँ</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Admin]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 01 Oct 2023 11:49:50 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>क़ुरआन और मासूमीन अ.स. की हदीसों में वालेदैन के साथ नेक बर्ताव और अच्छे अख़लाक़ से पेश आने पर बहुत ज़ोर दिया गया है, अल्लाह ने कई जगहों पर अपनी वहदानियत, इबादत और शुक्र अदा करने के हुक्म के साथ वालेदैन के साथ नेक बर्ताव करने और उनका शुक्रिया अदा करने का हुक्म दिया है। इंसान एक सामाजिक मख़लूक़ है इसलिए अल्लाह ने उसे अलग अलग रिश्तों में पिरोया है और हर एक पर दूसरों के कुछ हक़ और कुछ ज़िम्मेदारियां हैं जिसको अदा करना</p>
<p>The post <a href="https://shiaqaumlive.com/quran-and-masoomin-a-s-responsibilities-of-children-to-parents-in-the-light-of-hadith/">क़ुरआन और मासूमीन अ.स. की हदीस की रौशनी में वालेदैन के लिए औलाद की ज़िम्मेदारियाँ</a> appeared first on <a href="https://shiaqaumlive.com">Shiaqaum Live - Hindi &amp; Urdu News Portal</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>क़ुरआन और मासूमीन अ.स. की हदीसों में वालेदैन के साथ नेक बर्ताव और अच्छे अख़लाक़ से पेश आने पर बहुत ज़ोर दिया गया है, अल्लाह ने कई जगहों पर अपनी वहदानियत, इबादत और शुक्र अदा करने के हुक्म के साथ वालेदैन के साथ नेक बर्ताव करने और उनका शुक्रिया अदा करने का हुक्म दिया है।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class=" wp-image-724 alignright" src="https://shiaqaumlive.com/wp-content/uploads/2023/10/parents.jpeg" alt="" width="361" height="227" /><br />
इंसान एक सामाजिक मख़लूक़ है इसलिए अल्लाह ने उसे अलग अलग रिश्तों में पिरोया है और हर एक पर दूसरों के कुछ हक़ और कुछ ज़िम्मेदारियां हैं जिसको अदा करना हर एक के लिए ज़रूरी है, इन सारे रिश्तों में सबसे अहम और पहला रिश्ता हर इंसान का अपने वालेदैन से है, क्योंकि अल्लाह के बाद वही हैं जिनके वुजूद की बरकत से हर इंसान इस दुनिया में वुजूद की नेमत पाता है, यानी वालेदैन की वजह से ही इंसान जिसका कोई वुजूद नहीं था उसे वुजूद मिला और वह इस दुनिया में आया ताकि इंसानी कमाल के दर्जों को तय कर के ऊंचे मक़ाम हासिल करे, हक़ीक़त में इंसान में पाई जाने वाली सारी ख़ूबियों, अच्छाईयों और नेक आदतों की बुनियाद उसके वालेदैन ही हैं, यही वजह है कि अल्लाह ने क़ुर्आन में अपनी बंदगी और इताअत के बाद वालेदैन के साथ एहसान और नेकी करने का हुक्म दिया है, और जिस तरह इबादत के बिना बंदगी का हक़ अदा नहीं हो सकता उसी तरह वालेदैन के साथ नेकी और एहसान के बिना उनका हक़ भी अदा नहीं हो सकता।<br />
क़ुर्आन और मासूमीन अ.स. की हदीसों में वालेदैन के साथ नेक बर्ताव और अच्छे अख़लाक़ से पेश आने पर बहुत ज़ोर दिया गया है, अल्लाह ने कई जगहों पर अपनी वहदानियत, इबादत और शुक्र अदा करने के हुक्म के साथ वालेदैन के साथ नेक बर्ताव करने और उनका शुक्रिया अदा करने का हुक्म दिया है। (वालेदैन को नेकी और एहसान करने का हुक्म- सूरए बक़रह, आयत 83, सूरए निसा, आयत 36, सूरए इसरा, आयत 23, 24, सूरए अनकबूत, आयत 8, और वालेदैन का शुक्रिया अदा करने का हुक्म सूरए लुक़मान आयत 14 में, और वालेदैन के हक़ में दुआ करने का हुक्म सूरए इब्राहीम आयत 41 और सूरए नूह आयत 28 में)<br />
इसी तरह हदीसों में भी वालेदैन की ख़िदमत की अहमियत पर ताकीद और उसकी फ़ज़ीलत बयान की गई है।<br />
अल्लाह का इरशाद है कि, और तुम्हारे रब ने हुक्म दिया है कि तुम उनके अलावा किसी की इबादत नहीं करोगे और अपने वालेदैन के साथ नेक रवैये से पेश आओगे, अगर उनमें से कोई एक या वह दोनों तुम्हारे सामने बूढ़े हो जाएं (और तुम्हें उनकी कोई बात बुरी लगे) तो उनको उफ़ तक मत कहना और न ही उन्हें झिड़कना और उनसे नर्म लहजे में बात करना और उनसे मेहेरबानी, मोहब्बत, विनम्रता और झुक कर पेश आना और कहना ऐ परवरदिगार तू उन पर उसी तरह रहम फ़रमा जिस तरह उन्होंने मुझे पाला है। (सूरए इसरा, आयत 23, 24)<br />
इस आयत में अल्लाह ने ख़ास तौर से वालेदैन के बुढ़ापे का ज़िक्र फ़रमाया है कि अगर वालेदैन में से कोई एक या वह दोनों तुम्हारी ज़िंदगी में बूढ़े हो जाएं तो उनके सामने उफ़ तक मत कहो, बुढ़ापे की हालत को ख़ास तौर इसलिए ज़िक्र फ़रमाया ताकि वालेदैन की जवानी में औलाद को उफ़ कहने की हिम्मत नहीं होती और न ही वह उन्हें झिड़क सकते हैं, अधिकतर वालेदैन की जवानी में उनके साथ बदतमीज़ी और गुस्ताख़ी का ख़्याल कम ही होता है, हालांकि बुढ़ापे में जब वह कमज़ोर और औलाद के मोहताज होते हैं तो उस समय इस ख़तरे की संभावना बढ़ जाती है और दूसरी तरफ़ बुढ़ापे में आम तौर से कमज़ोरी और मजबूरी की वजह से इंसान के मिजाज़ और रवैये में चिड़चिड़ापन और झुंझलाहट पैदा हो जाती है, तो यह एक तरह का औलाद का इम्तेहान है कि वह अपने वालेदैन के साथ अच्छा सुलूक करे, जैसे वह औलाद के बचपन में हर तरह की तकलीफ़ और सख़्तियों को हंसी ख़ुशी बर्दाश्त करते थे, इमाम अली अ.स. फ़रमाते हैं अगर वालेदैन की बे अदबी और बदतमीज़ी में उफ़ से कम दर्जे की कोई चीज़ होती तो परवरदिगार उसे भी हराम क़रार दे देता। (दुर्रुल मंसूर, जलालुद्दीन सियूती, जिल्द 5, पेज 224, वसाएलुश-शिया में शैख़ हुर्रे आमुली र.अ. ने जिल्द 1 पेज 500 पर इसी मज़मून की हदीस इमाम सादिक़ अ.स. से नक़्ल हुई है)<br />
सूरए अनकबूत आयत न. 8 में अल्लाह का इरशाद है, हमने इंसानों को अपने वालेदैन के साथ नेक रवैया रखने की नसीहत की है और अगर वह कोशिश करें कि तुम मेरे साथ उसे शरीक क़रार दो जिसका तुम्हें कोई इल्म नहीं तो कभी भी उनका कहना मत मानना, तुम सबके मेरी तरफ़ पलट कर आना है फिर मैं हर उस चीज़ से बा ख़बर करूंगा जो तुम करते रहे हो।<br />
वालेदैन का हक़ कभी ख़त्म नहीं होता, इसलिए उनके साथ हमेशा नेकी और भलाई से पेश आना वाजिब है चाहे वह काफ़िर ही हों, इसलिए उनके साथ नेकी करना, उनके मुसलमान होने के साथ ख़ास नहीं है बल्कि उनके साथ हर हालत में अच्छा बर्ताव ज़रूरी है चाहे वह काफ़िर ही हों, यही वजह है कि इस्लाम ने बड़ी सख़्ती से उनके विरोध और नाफ़रमानी से डराया है और वालेदैन की नाफ़रमानी और विरोध को शिर्क के बाद सबसे बड़ा गुनाह क़रार दिया है।<br />
मासूमीन अ.स. की हदीसों और रिवायतों में भी वालेदैन की बहुत ज़्यादा अहमियत बयान हुई है और उनके साथ नेक रवैये से पेश आने पर बहुत ज़ोर दिया गया है, हम इस लेख में बस कुछ हदीसों का ज़िक्र कर रहे हैं।<br />
** पैग़म्बर स.अ. फ़रमाते हैं कि मां बाप की इताअत करो चाहे वह काफ़िर क्यों न हो। (अहादीसुत-तुल्लाब, शाकिर फ़रीद, पेज 251)<br />
** पैग़म्बर स.अ. फ़रममाते हैं कि वालेदैन की तरफ़ देखना भी इबादत है। (बिहारुल अनवार, अल्लामा मजलिसी र.अ., जिल्द 1, पेज 204)<br />
** इमाम अली अ.स. ने फ़रमाया कि अपने वालिद और अपने उस्ताद के सम्मान में अपनी जगह से खड़े हो जाओ चाहे तुम अमीर और ऊंचे पद पर ही क्यों न हो। (मुस्तदरकुल वसाएल, मिर्ज़ा हुसैन नूरी र.अ., जिल्द 15, पेज 203)<br />
मां की दुआ का असर<br />
मां की दुआ का असर इतना ज़्यादा है कि अल्लाह उसकी दुआ के नतीजे में न केवल यह कि औलाद को बख़्श देता है बल्कि मां की दुआ औलाद को नबियों का हमनशीं (साथी) बना देती है, जैसाकि हज़रत मूसा अ.स. की मशहूर दास्तान है&#8230;.<br />
एक दिन हज़रत मूसा अ.स. ने मुनाजात करते हुए अल्लाह की बारगाह में कहा, ख़ुदाया तुझसे मेरा एक सवाल है कि जन्नत में सेरा हमनशीं और साथी कौन होगा? जिब्रईल नाज़िल हुए और कहा, ऐ मूसा (अ.स.) अल्लाह ने तुम्हें सलाम भेजा है और फ़रमाया है कि तुम्हारा साथी जन्नत में फ़लां क़साई होगा, हज़रत मूसा अ.स. उस क़साई की दुकाम पर पहुंचे, देखा एक जवान क़साई अपने काम में मसरूफ़ है और लोगों के हाथों गोश्त बेच रहा है, कुछ देर तक हज़रत मूसा अ.स. देखते रहे लेकिन उसका कोई ख़ास अमल दिखाई नहीं दिया, जब रात हुई तो क़साई ने अपनी दुकान बंद की और घर की तरफ़ चल पड़ा, हज़रत मूसा अ.स. उसके साथ उसके घर तक आए, जब घर के दरवाज़े पर पहुंचे तो हज़रत मूसा अ.स. ने कहा, ऐ जवान, मेहमान चाहिए?<br />
उस शख़्स ने कहा, मेहमान तो अल्लाह का हबीब होता है, आप घर तशरीफ़ लाइए, उस जवान ने इस अंजान शख़्स को घर के अंदर बुलाया और खाना तैयार करने लगा, फिर उसने एक गहवारे जैसी टोकरी जो छत से नीचे लटकी हुई थी उसे नीचे उतारा जिसमें एक बूढ़ी औरत लेटी हुई थी, उस जवान ने उस औरत का हाथ मुंह धुलाया और उसके बाद अपने हाथों से खाना खिलाया, जब वह खा चुकी तो उसे दोबारा उस गहवारे जैसी टोकरी में लिटा कर दोबारा छत से लटका दिया, हज़रत मूसा अ.स. ने देखा कि उस बूढ़ी औरत में होंटों को हिलाते हुए कुछ कहा, लेकिन हज़रत मूसा अ.स. सुन न सके कि उसने क्या कहा, जिस समय वह जवान और हज़रत मूसा अ.स. खाना खाने लगे तो हज़रत मूसा अ.स. ने पूछा कि यह बूढ़ी औरत कौन है?<br />
उस जवान ने कहा कि यह मेरी मां है, मेरी माली हालत ऐसी नहीं है कि मैं किसी ख़िदमत करने वाली को रख सकूं जो इनकी देख भाल कर सके इसलिए उसके सारे काम मैं ख़ुद अंजाम देता हूं, हज़रत मूसा अ.स. ने पूछा, ऐ जवान, जब तुम खाना खिला रहे थे तो वह क्या कह रही थीं? जवान ने कहा कि जब मैं उनके हाथ पैर धुलाता हूं और उन्हें खाना खिलाता हूं तो वह मेरे हक़ में दुआ करती हैं और कहती हैं कि अल्लाह तेरी मग़फ़ेरत फ़रमाए और तुझे जन्नत में हज़रत मूसा अ.स. का साथी क़रार दे, हज़रत मूसा अ.स. ने फ़रमाया, ऐ जवान, मैं तुझे बशारत देता हूं कि अल्लाह ने तेरे हक़ में तेरी मां की दुआ क़ुबूल कर ली है क्योंकि मैं मूसा हूं और जिब्रईल ने मुझे यह बात बताई है कि जन्नत में तुम मेरे साथी होगे। (गंजीनए-मआरिफ़, मोहम्मद रहमती, जिल्द 1, पेज 196)</p>
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